शब्दशास्त्रम्


तस्कर
शालिग्राममे छिद्र होइत अछि, कारी पाथर मात्र नर्मदामे भेटैत अछि। जमसम गाममे सभ किछु बदलल अछि, ग्रामदेवताक डिहबार स्थानसँ लऽ कऽ सभ ठाम मुदा किछु ने किछु लाक्षणिक वस्तु देखिये रहल छी। मुदा हमर गाथाक कोनो लक्षण एतए नहि अछि।
गाछी आ बाध बोन सभटा पतरा गेल अछि। सए बर्ख। बिज्झू आमक ओ गाछी। बीहरि सभसँ भरल। भाँति-भाँतिक चिड़ै-चुनमुनी आ छोट पैघ जीव-जन्तु। नेना रही। जेठसँ अगहन खुरचनिञा लत्ती लग गप करैत हम आ मालती। कहियो फागुन-चैतमे जाइ तँ लवङलताक लत्ती लग गप करी। मलकोका, कुमुद, भेंट, कमलगट्टा कन्द, रक्ताभ बिसाँढ़क ताकिमे कादो-पानिमे घुमैत हम आ ओ। खुल्ले पएर, काँट-कूसक बीच तड़पान-तड़पि कऽ कुदैत। आमक कलममे सतघरिया खेलाइत। हम आ मालती। करबीरसँ बेढैत अपन काल्पनिक-घर। एकहरा, दोहारा, जटाधारीक बीआ भरि साल जोगबैत मालती। मालती सेहो होएत हमरे बएसक। माए कहैत छल जे मालती छह मासक जेठ छल हमरासँ मुदा पिता कहैत छला जे छह मासक छोट अछि मालती हमरासँ। आ पिता से किएक कहै छलाह से बादमे जा कऽ ने बुझलिऐ।
भरि आमक मास आमक गाछीक दिनुका ओगरबाहीक भार हमरे दुनू गोटेपर छल। मुदा साँझ होएबासँ पहिने हमर मामा बछरू आ मालतीक बाबू खगनाथजी कलम आबि जाइत छलाह, रातिक ओगरबाहीक लेल। मुदा हमर सभक गाथाक कोनो लक्षण एतए सेहो नहि अछि। हमर सभक माने केशव आ मालती
मुदा ओहि पक्काक डिहबार स्थान लग कारी रंगक शालिग्राम हम ताकि रहल छी। छिद्रयुक्त शालिग्राम। एकटा नुका कऽ रखने छलहुँ एत्तै कतहु।
गौँआ सभ धरि खूब खर्चा कएने अछि एहि डिहबारक स्थानक मंडप बनएबामे। पहिने तँ किछुओ नञि रहै। राजा जे बनेलक पोखरिक घाट आ तकर कातमे पक्काक मन्दिर सएह। मुदा बेचारो पूजा कैयो नञि सकलाह। लाजक द्वारे हमर एहि गाममे आबियो नञि सकलाह।

हम केशव, गाम मंगरौनी, नरौने सुल्हनी, पराशर गोत्र, कवि मधुरापतिक पुत्र।
मालती- माण्डर सिहौल मूलक काश्यप गोत्री खगनाथ झा, गाम जमसमक पुत्री मालती।
खगनाथजी आ हमर मामा बछरूमे भजार लागल। जमसममे हमर मामा गाम। मामागाम धरि सुखितगर, हम सभ तँ दरिद्रे। से हम एक मास गरमी तातिल आ पन्द्रह दिन दुर्गापूजासँ छठि धरि मामेगाममे रहैत रही। गरमी तातिलमे सपेता पकबासँ लऽ कऽ कलकतिया आम पकबा धरि गाछी ओगरी। आ दुर्गापूजामे खष्ठीसँ लऽ कऽ भसान धरि दुर्गापूजा देखी। फेर दीयाबातीमे कनसुपती जराबी आ छठिमे गाम घुरि जाइ। आ बीच-बीचमे तँ जाइत रहबे करी।
मालती संगे खूब झगड़ा सेहो होइ छल। चौथामे रही प्रायः। गरमी तातिलमे मामा गामक आमक गाछी गेल रही। कोनो गपपर मालतीसँ रूसा-फुल्ली भऽ गेल। धरि बौसलक मालतीये। आ बौसबो कोना केलक।
-हम अहाँसँ घट्टी मानै छी ओहि गपक लेल।
-कोन गप।
-जइ गपपर अहाँसँ झगड़ा भेल।
आ ओ गप नञि हमरा मोन पड़ल आ ने मालतीकेँ। मुदा फेर मालतीसँ कहियो कोनो गपपर हम झगड़ा नञि केलहुँ। वएह मुँह फुलाबए तँ हमही पुछिऐ जे कोन गपपर मुँह फुलेलहुँ से तँ मोन नहिये हएत तखन अनेरे ने झगड़ा करै छी।
गरमी तातिलक बाद दुर्गापूजा आ दुर्गापूजाक छुट्टीक बाद गरमी तातिलक बाट जोहै लगलहुँ। से कहियासँ से की मोन अछि ?

पिता गाममे बटाइ करथि। मिडिल स्कूलक बाद कोनो स्कूल नहिये रहै आस-पड़ोसमे। संस्कृत पाठशाला सभ बन्ने भऽ गेल रहै।
से तातिल बला कोनो बात आब रहबे नञि करए। भरि साल बुझू काजे आकि तातिले। नाना-नानी जिबिते रहथि। माएक लियौन कराबए लेल कियो ने कियो आबिये जाइ छल। हमहुँ दू चारि मासमे मामा गाम कोनो लाथे भइये अबैत छलहुँ।
गामपर कएक टा समस्या। नञि जानि कोन भाँज रहै जे पाँजिक रक्षाक गप पिताक मुँहे सुनैत रहैत छलहुँ। आ से हमर बियाह मालती संगे भेने टा सँ सम्भव, सेहो हुनका मुँहे उचरैत छलन्हि।
मालती हमर संगी मुदा एहि गप-शपसँ ओकर हमर दूरी बढ़ि जेकाँ गेल। जे सहजता हमरा आ ओकरा मध्य छल से खतम होअए लागल। जेना ओकरा देखिते हमर मोनमे पत्नीक छवि नजरि आबै लागल छल, तहिना तँ ओकरो मोनमे ने अबैत होएतैक।

हमर गाम आएल रहथि बछरू मामा।
मधुरापति- “बछरू आब अहींक हाथमे हमर सभटा इज्जत अछि। खगनाथक पुत्री केशवक लेल सर्वथा उपयुक्त। सुन्दरि सुशील अछि तँ केशव सेहो जबर्दस्त अछि। एक्के बतारीक अछि मुदा किछु दिनुका छोटे अछि मालती। हे। अहाँकेँ तँ ई बुझले अछि जे  ७०० टाका लड़कीबलाकेँ दए हमर विवाह करा हमर पिता पाँजि बनाओल। मुदा आब जमीन जत्था नहि अछि। काल्हि घोड़ीकेँ चिलम पियाए ओहिपर चढ़ि आएल छलाह पञ्जीकार। साफे कहि देलन्हि जे मात्र खगनाथेक पुत्रीसँ अधिकारमाला बनैत अछि। आ से नहि भेने पुबारिपार श्रोत्रियक श्रेणीसँ चुत भऽ जाएब हम”।
बछरू- “हम पुछै छियन्हि खगनाथसँ। संगी तँ छथि मुदा हुनकर मोनमे की छन्हि से वएह ने कहताह”।

आ ने जानि किएक प्रेमसँ भरि गेल छल हमर मोन। बिदा भऽ गेल रही हुनका संगे।

मालती- “केशव। तोहर कत्तौ दोसर ठाम बियाह भऽ जएतौक तखन हमरासँ भेँट कोना होएतौक”।
केशव- “आ तोहर ककरो दोसरासँ बियाह भऽ जएतौक तँ एहन अनर्गल प्रश्न सभ ककरासँ करमे”?
मालती- “मुदा एकटा गप बुझलहीं। काल्हि तोहर मामा हमर पितासँ हम्मर-तोहर बियाहक चरचा कऽ रहल छलाह”।
केशव- “तखन”।
मालती- “नञि, सभटा तँ ठीके मुदा तखने दरभंगा राजाक दूत बनि एक गोटे आबि गेलाह आ कहए लगलाह जे राजाक समाद अछि”।
केशव- “राजाक कोन समाद”।
मालती- “कियेने गेलिऐ। मुदा हमर पिताकेँ ओ दूत कहलन्हि जे बेटीक बियाहक चर्च किछु दिन रुकि कऽ करबाक लेल”।
केशव- “तोहर सुन्दरताइ तँ छौहे तेहने। राजोक नजरिमे तोरा लेल कोनो लड़का अभरल छै की”?
मालती- “कियेने गेलिऐ”।
राजाक मन्त्रीक सवारी खगनाथक दरबज्जापर! दुइये दिनमे कीसँ की भऽ गेल। ओ दूत जा कऽ किछु कहि तँ नञि अएलै जे खगनाथ अपन बेटीक बियाह लेल धरफरायल छथि। से सतर्की देखियौ। लोक सभ गर्दमगोल करैत। सभ स्वागतमे जुटल। आ हमहुँ सभ चीजक जाएजा लैत रही। साँझ होइत-होइत हमर पिता सेहो आबि गेल छलाह। ओम्हर राजाक मन्त्रीक स्वारी गेल आ एम्हर हमर पिता माथपर हाथ रखने गुम्म रहि गेलाह। खगनाथ सेहो मौन।
राजा अपन बियाह मालतीसँ करबाक प्रस्ताव खगनाथ लग पठेने छलाह। महाराज बीरेश्वर सिंह। कहू तँ। अपने चालीससँ उपरे होएत आ एहि तेरह-चौदह बरखक बचियासँ बियाहक प्रस्ताव। खगनाथक की ओकाति जे ओकरा मना करितथिन्ह।
हमर पिता चिन्तित जे आब पाँजि नहि बाँचत।
ओहि दिन साँझमे कोनटा लग मालतीसँ हमर भेँट भेल। करजनी सन-सन आँखि फुलल, जेना हबोढ़कार भऽ कानल होअए। की सभ गप केलहुँ मोनो नञि अछि। हँ आखिरीमे हम कहने धरि रहिऐ जे सभ ठीक भऽ जाएत।
जमसममे बीरेश्वर सिंह लेल लड़की निहुछल गेल!
जमसम गाममे पोखरि खुनाओल गेल। ओतए मन्दिर बनल जे राजा दोसराक मन्दिरमे कोना पूजा करताह।
मुदा हमहुँ रही मधुरापति कविक पुत्र केशव।
बियाहक दिन लगीचे रहै आ दोसर कोनो दिन सेहो नञि रहै। आ ओहि दिन मालतीसँ सभ गप भइये गेल छल।
कटही गाड़ीमे आगूक चाप आ पाछूक उलाड़, आगाँक चाप नीक कारण पाछाँ उलाड़ भेलापर गाड़ी उनटि जाएत। मुदा हम ओहिना गाड़ीकेँ उलाड़ केने बँसबिट्टी लग मालतीक इन्तजारीमे रही।
ओ आयलि आ गाड़ीपर बैसि गेलि। जे कियो रस्तामे देखए से डरे नञि टोकए जे गाड़ी ने उनटि जाइ एकर। एकटा पतरंगी चिड़ै देखि उल्लसित होअए लागलि मालती तँ आँगुरसँ हम ओकर ठोढ़ बन्न कऽ देलिऐ।
मालतीकेँ लऽ कऽ गाम आबि गेलहुँ, धोती रंगाइत छल। फेर जे मालतीक पता करबाक लेल आएल रहए तकरा पकड़ि राखल। आ ’कन्यादान के करत’क अनघोल भेलापर ओकरा सोझाँ अनलहुँ जे कन्यादान यएह करबाओत।
सलमशाही चमरउ जुत्ता उतारि धोती पहीरि हम विवाह लेल विध सभ पूर्ण केलहुँ।  मालतीक सीथमे सिनुर हमरे हाथसँ देब लिखल जे रहै।

तकर बाद राजा बीरेशवर सिंह की करताह?
पञ्जीकारकेँ बजा कऽ हमर नाममे तस्कर उपाधि लगबाओल। मुदा मधुरापति अपन पुत्रक प्रति गर्वोन्नत्त। बाघक बेटा बाघ। पाञ्जि आ पानि अधोगामी मुदा खगनाथ झा- श्रीकान्त झा पाँजि, तस्कर केशवक श्रोत्रिय ओहिठाम विवाह कएलापर श्रोत्रिय श्रेणी विराजमान रहतन्हि।
आ सए बर्खक बाद आइ एहि गाममे कोनो नाटक होएतैक। सुल्ताना डाकू।
आ हम तस्कर केशव, मंगरौनी नरौने सुल्हनी- पराशर गोत्र, कवि मधुरापतिक पुत्र अपन गाथाक कोनो एकटा लक्षण एतए जमसम गाममे ताकि रहल छी। मुदा राजा बीरेश्वर सिंहक वएह पोखरि आ आब ढ़नमनाएल मन्डिल देखै छी, बेचारो घुरि कऽ लाजे एहि गाममे एबो नहि केलाह।
यएह पोखरि आ ढ़नमनाएल मन्दिर हमर प्रेमक अछि अवशेष।







संघर्ष

फाइलक गेँट, गरदासँ सनल। ओहिमे सँ एक-एकटा कागत निकालि मुँहपर रुमाल राखि झारि रहल छी। ओहिमे सँ किछु काजक वस्तु निकलैत अछि, किछु बेकाजक। विधवा सोहागोक केस-मुकदमाक फाइल। मान-अपमानक खाता-खेसरा। आरोप-प्रत्यारोपक प्रकरणक क्रम। बूढ़ महिलाक युवावस्थाक खिस्सा, किछु सत्य, किछु मिथ्यारोप। पति आ पुत्रक जीवन। बेनग्न होइत हमर सभक सभ्यताक छाप। किएक चानन घसने रहैत अछि ई बूढ़ी। भगवान पर एतेक भरोस? एहि उमरिमे बेटाक स्मारक बनेबाक जिद्द? हारि आ जीतक तारतम्यक बीच, एखन फेर एकटा दोसरे पेटीशन? जितबाक कोन अद्भुत लगन लागल छैक ओकरा। हारिते रहल अछि भरि जिनगी, तैयो!
पहिने तँ कुमोनसँ मंडल सरक कहलापर ई काज हाथमे लेने रही। मुदा आब हमरो इच्छा भऽ गेल अछि, इच्छा ओकर पेटीशनकेँ यथाशीघ्र दाखिल करबाक। इच्छा ओकरा जितेबाक। ई फाइलक गरदा, गरदासँ सानल कागत-पत्तर सभ। डस्टसँ एलर्जी अछैत हम एहिमे घोसिया गेल छी। एहि बुढ़ियाक हारिक नमगर फेहरिस्ट, तकर सोझाँ हमर अपन हारि सभक कोनो लेखा नहि। एकरा जितएबाक जिद्दक आगाँ अपन अप्रत्यक्ष विजय लखैत अछि। सोझाँ-सोझी विजय नहि तँ एहि बुढ़ियाक माध्यमसँ सम्भावित विजयक पेटीशन। हारत तँ ई बुढ़िया आ जे ई बुढ़िया जीतत तँ जीतब हम। ई बुढ़िया धरि अछि अगरजित। ऑफिसमे सभसँ झगड़ा केने अछि। कार्यालयक क्यो गोटे एकर पेटीशन आगाँ बढ़ेबाक लेल तैयार नहि। मंडल सर मुदा एकर सभटा नखड़ा बरदास्त करैत छथि। एकर बेटा हुनकर बैचमेट छलन्हि। नीक लोक छथि, सज्जन। कार्यालयक कनीय सदस्य सभसँ हमरा कहियो कोनो प्रतियोगिता नहि होइत अछि। मुदा उच्च पदाधिकारी सभसँ फाइलोपर आ ओहिनो किछु ने किछु होइते रहैत अछि। मुदा मंडल सर नीक लोक। सज्जन। आ एहि पेटीशनकेँ देबाक भार ओ हमरेपर छोड़ने छथि। बुझल छन्हि जे अधिकारी सभ ओहि पेटीशनमे नेङरी मारत। आ तखन दोसर सभ बीचेमे पेटीशन छोड़ि भागि जएत। मुदा हम तँ से भेलापर पाछू पड़ि जाएब आ तखन पेटीशन दाखिल भऽ सकत हमरे बुते। ई विश्वास छन्हि मंडल सरकेँ।
“अहाँपर सँ हमर विश्वास उठि गेल अछि ।  एक महिनासँ झुट्ठे घुमा रहल छी। एखन धरि पेटीशन नहि भेल दाखिल कएल”- बुढ़िया आइ लगा कऽ तेसर बेर ई सभ गप सुनेलक अछि आ चलि गेल अछि। पहिल बेर तँ हम मंडल सरकेँ कहबो केलियन्हि जे कोन फेरमे हमरा सभ पड़ल छी। एहि बुढ़िया लेल जान-प्राण लगेने छी। मुदा देखू, दस टा गप सुना कऽ चलि गेल। मुदा मंडल सर कहलन्हि जे- “नञि यौ। समएक मारल अछि ई । जेहन लोक सभसँ आइ धरि एकरा भेँट छै, तेहने ने बुझत ई अपना सभकेँ”। ई गरदा सानल फाइल सभकेँ मुदा आब घोंटि गेल छी हम, बुझू सोंखि गेल छी। आइ फेर बुढ़िया ई सभ गप कहि बहार भऽ गेल। हम आ मंडल सर एक दोसराकेँ देखि रहल छी। बिनु हँसने। पराजयक छाह दुनू गोटेक मुँहपर अछि।
“भऽ गेल अछि सर। एहि शुक्र धरि पेटीशन दाखिल भऽ जाएत”।
“मुदा अहाँक स्थानान्तरण भऽ गेल अछि, शुक्र दिन धरि अहाँकेँ जएबाक अछि”।
“कहलहुँ ने हम। भऽ जाएत शुक्र दिन धरि। जएबासँ पहिने दाखिल कइये कऽ जाएब। परिणाम तँ बादमे पता लागिये जाएत”।
बिनु हँसने, बिनु तमसाएल मुखाकृति लेने बहराइत छी। कऽ दैत छिऐक दाखिल एकर पेटीशन। हारत तँ ई हारत। जीतत जे ई, तँ जीतब हम।


सोहागो। गढ़ बलिराजपुरक बसिन्दा एकर परिवार। खेती-बाड़ी नीक, तरकारी बेचि नीक जमीन-जत्था बनेने। छह भाँएपर भेल छलीह सोहागो।
पिताक दुलारि। माताक दुलारि। सभ भाएँक दुलारि। मुदा मात्र दस बरख। फेर विवाह भऽ गेलन्हि। पतिसँ प्रेम छलन्हि वा नहि छलन्हि, ई गप गरदा लागल कोर्ट फाइलमे नहि लिखल अछि।
हुनकर नैहरक चर्च मात्र एक पैराग्राफमे खतम अछि। मात्र ई विवरण अछि जे पतिक मृत्यु भऽ गेलन्हि जखन हिनकर उमरि अठारह बरखक छलन्हि।
मुदा एकटा बेटा भगवानक कृपासँ मृत्युक पूर्व पति हुनका दऽ गेल छलखिन्ह। अठारह बरखक उमरि। एकटा बच्चा।
मुदा गरदाबला फाइलमे नहिये सासुरक कोनो लोकक आ नहिये नैहरक कोनो भाए-बन्धुक कोनो गबाही वा किछुओ भेटल। ताहिसँ ई लागल जे भाए सभ अपन-अपन परिवारमे व्यस्त भऽ जाइ गेल होएताह। तखन सोहागोक ई बयान जे ओ नैहरक दुलारि छलीह! माए-बापक आ छह भाँएक। माए-बाप तँ चलू बूढ़ भऽ मरि गेल होएताह, मुदा भाए सभ?
कष्ट काटि अफेलकेँ पढ़ेलन्हि-लिखेलन्हि सोहागो। बीस बरखक बेटा भेलन्हि तँ ओहो मृत्युकेँ प्राप्त कएलक। नीक सरकारी नोकरी भेटले छलैक। घटक सभ घुरियाइये रहल छलैक। आठ बरखक वैवाहिक जीवनक बाद बीस बर्खक वैधव्य। आब पुतोहु अबितैक आ नैत-नातिन संगे ओ खेलाइतए। मुदा तखने ई वज्रपात। मुदा हमर तँ तहिया जन्मो नहि भेल छल होएत। नञि, सत्ते। बुझू जाहि बरख एहि बुढ़ियाक बेटाक मृत्यु भेल छलै, ताहि बरख हमर जन्म भेल रहए। आ तकरो बाइस बरख बीति गेल। बूढ़ी आब हमरा समक्ष अछि। ओकर बेटाक बैचमेट हमर मंडल सर। आ हम ओही पदपर छी जाहि पदपर ओकर बेटा आइसँ बाइस बर्ख पहिने नोकरी शुरूह कएने रहए। छह मास मात्र नोकरी कएने रहए आकि...। शुक्र दिन धरि समय बाँचल अछि हमरा लग। की करू? ई बुढ़िया हहाएल-फुफुआएल अबैत अछि। सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक आग्रह लोक सभसँ करैए, कैक बरखसँ। मुदा एकर झनकाहि बला स्वभावसँ, व्यवहारसँ लोक एकरापर तमसा उठैत अछि। एकरा अर्द्ध-बताह घोषित कऽ देल गेल अछि। मुदा एहि बेर तँ एकर काज किछु दोसरे तरहक छैक। अही सप्ताह किछु करए पड़त। देखै छी।
 “अफेलकेँ मरबाक रहितै तँ अहाँक रिवाल्वरसँ अपन माथपर किऐ मारितए। ओकरा लग तँ अपन सर्विस रिवाल्वर रहए”।
“श्रीमान्। हमर बेटाक हत्या कएने अछि जटाशंकर। हमर जीवन नर्क बना देलक। बीस सालक हमर तपस्या समाप्त कऽ देलक। एकरा सजाए देल जाए”।
“मुदा जज साहेब। जटाशंकर आ अफेलक अलाबे ओहि घरमे क्यो नहि छल। हमर कानून कहैए जे दस दोषी बहरा जाए मुदा एकटा निर्दोषकेँ सजा नहि भेटए। के गबाही देत जखन तेसर क्यो रहबे नहि करए”?
“मुदा जज साहेब अपने कहि रहल छथि जे अफेल दोसराक रिवाल्वरसँ अपनापर गोली किएक चलाओत। आ अपनापर गोली चलेबाक अर्थ भेल आत्महत्या। हमर बेटा हमरा असगर छोड़ि आत्महत्या कऽ लेत? किएक करत ओ आत्महत्या”?
“जटाशंकरकेँ हिरासतमे लेल जाए...अगिला सुनवाई....”।
फाइल पढ़िते रही आकि बूढ़ी बिहाड़ि जेकाँ आएलि।
“अहाँक चेलाक तँ ट्रांसफर भऽ गेल मंडल सर! सभ एक्के रंगक छी। हमर बेटाक मूर्ति कॉलोनीक गेटपर लागि जाइत तँ कोन अनर्थ भऽ जइतैक। मुदा सभ अपन-अपन घर परिवारमे लागल अछि! जे गेल से गेल। अनका की कहू, हमर भाइये सभकेँ देखू। कहै लेल तँ छह टा....”। हनहन-पटपट करैत ओ बहार भऽ गेलि। मंडल सर ओकरा-“सुनू। हिनकर ट्रांसफर भेल छन्हि मुदा एखन शुक्र दिन धरि रहताह”- ई सभ कहिये रहल छलाह मुदा ओ भङ्गतराहि नहि सुनलक। किएक सुनत?
“की भेल? जाए दियौक। शुक्र दिन पेटीशन फाइल भऽ जएतैक तँ ओकर गोस्सा अपने ठंढ़ा भऽ जएतैक”।
“कहू जटाशंकर। हमरा तँ अफेलक आत्महत्याक कोनो कारण नहि बुझना जाइत अछि। ई सत्य जे ओहि मृत्युक गबाह नहि अछि। मुदा ओहि कोठलीमे मात्र दू गोटे रहथि। अफेल आ जटाशंकर। आ अहाँक रिवाल्वरक गोली अफेलक माथमे गेलैक।”
“मुदा जज साहेब। हमरा किछु सूचना भेटल अछि जाहिसँ हमर दिमाग घूमि गेल अछि। ओना हम ई सूचना सार्वजनिक करबाक पक्षमे नहि छलहुँ कारण एहिसँ एकटा भूचाल आओत। मुदा जखन हमर क्लाइन्टपर फाँसीक सजाक खतरा घुरमि रहल अछि, हमरा लग एकरा सार्वजनिक करबाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नहि अछि।”
“ई कारी कोट पहीर फेर कोनो बहन्ना अनने अछि। हम गरीब लोक छी सरकार। हमरा कोर्टक तारीखपर आबएमे ढेर खरचा उठबए पड़ैत अछि। एकरा सजा देनेसँ हमर बेटा घुरि कऽ तँ नहि आओत मुदा ई फेर एहन काज नहि करए से टा हम चाहै छी।”
“मुदा सोहागो देवीजी। ई केस कतेक माससँ चलि रहल अछि मुदा नहिये अहाँक परिवारक आ नहिये अहाँक सासुरक क्यो गोटे आएल”।
आगाँक आरोप प्रत्यारोपमे सोहागोपर चरित्रहीनताक आरोप लगाओल गेल रहै आ सिद्ध करबाक प्रयास कएल गेल रहै जे हुनकर पुत्र अपन माएक प्रेमी सभसँ आजिज आबि कऽ आत्महत्या कएने छल। जटाशंकर बचि गेल रहए। आब तँ ओ रिटायर भऽ सरकारी पेंशन उठा रहल अछि।
बिहारशरीफ घुरि हम बूढ़ीक पेटीशन दाखिल कऽ दै छी। पतिक मृत्युक बाद ऑफिस बला सभ सर्टिफिकेटक अभावमे ओकर जन्म तिथिपाँच साल घटा देने रहै, कोनो जानि बूझि कऽ से नहि। मुदा बुढ़िया तै जमानामे मैट्रिक छल। मैट्रिकक सर्टिफिकेटक जन्म तिथिक हिसाबसँ पाँच साल आर नोकरी छै। चलू, जे भेलै एकरा संग, देखी आब। अगिला साल रिटायरमेन्ट छै, जे पाँच साल बढ़ि जएतैक तँ आर नीक। हमर ट्रांसफर तँ भइये गेल रहए से हम अपन झोर-झपटा आ समान चीज-बौस्तु लऽ कऽ अपन नव गन्तव्य स्थलपर बिदा भऽ जाइत छी। कार्यालयसँ जाइत काल बुढ़िया भेटैत अछि, कल जोड़ने ठाढ़, जेना कहि रहल होए- धन्यवाद। हम ओहि काल्पनिक धन्यवादक उत्तर दै छी- काज भऽ जाए तखन ने।
कएक साल बीति गेल। किछु व्यस्तताक कारणसँ आ किछु पेटीशन अस्वीकृत भऽ जएबाक सम्भावित सम्भावनासँ परिणामक प्रति उत्सुक नञि रहै छी। मुदा मंडल सर एक दिन भेटि जाइ छथि।
“ओकर पेटीशन स्वीकृत कऽ लेलकै विभाग। रिटायरमेंटक दिनसँ पहिनहिये आदेश आबि गेल रहै। आब ओ पाँच साल आर संघर्ष करत, सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक लेल वा ….वा आन कोनो संघर्ष”।
आह! एहि बुढ़ियाक जीतक बाद हमर अपन हारि सभक नमगर फेहरिस्टक आब कोनो लेखा नहि। आब हमरो इच्छा भऽ गेल अछि, इच्छा जितबाक। सोझाँ-सोझी विजयक इच्छा, एहि बुढ़ियाक माध्यमसँ भेल अप्रत्यक्ष विजयक बाद।













सिद्ध महावीर
बान्हक कातमे अनमना दीदीक घर।
घर नहि झोपड़ी कहू। गामक मोटामोटी सभ अँगनामे एकटा विधवाक घर रहैत छै। मुदा जखने परिवार पैघ होइत अछि तँ क्यो अपन घरक मुँह घुमा लैत अछि तँ क्यो बेढ़ बना दैत अछि। आ कखनो काल ओहि राँड़-मसोमातक घरक स्थान परिवर्तन भऽ जाइत अछि, आ से तेहने सन स्थिति छल अनमना दीदीक घरक।
मुदा अनमना दीदीक घर बान्हक कातमे छन्हि। सोझाँक मजकोठिया टोलक छथि मुदा घुसकि कऽ हमर घर लग आबि गेल छथि।समङगर लोक सभ। आस-पड़ोसक धी-बेटी दिनमे, दुपहरियामे जाइत छथि। ढील-लीख बिछबाक लेल। ककर ओ लगक छथि, से मरलाक बाद पता चलत। श्राद्धक समए जे लगक अछि से आगि देत आ तकरा घरारी भेटतैक। मुदा सेहो सम्भावना आब नहि। झंझारपुरमे सासुर छलन्हि अनमना दीदीक। ओतए अपन बहिनिक बेटाकेँ अपन बेटा बना राखि लेने छथि। मुदा नैहरक मोह नहि छूटल छन्हि।
खोपड़ीमे अबैत छथि। मासमे एक बेर तँ अवश्ये। अपनेसँ खेनाइ-पिनाइ, भानस-भात। मुदा झंझारपुरमे बेस पैघ घर, आँगन। बेटा-पुतोहुकेँ कहियो मुदा एतए नहि आनलन्हि।
सौँसे गाम विधवाकेँ दीदी कहैत अछि जे ओ नैहरमे रहैत छथि। आ फलना गाम बाली काकी जे ओ सासुरमे रहैत छथि।
से सौँसे गाम हुनका अनमना दीदी कहैत छलन्हि।
खोपड़ीक कातमे एकटा भगवानक मन्दिर बनेने छथि। महावीर बजरंगबलीक। शुरुहेसँ ई कोठाक रहै से नहि, मुदा बना देलन्हि ओकरा कोठाक। अन्न-पानि बेचि कऽ। पहिने तँ खोपड़िये रहै। जहिया अनमना दीदी झंझारपुर जाइत रहथि, अपन खोपड़ीक फड़की भिरका कऽ जाइत रहथि। बादमे ताला आ सिक्कड़िसँ बन्न सेहो करए लागल रहथि। मुदा बजरंगबलीक मन्दिर ओहिना खुजल रहैत छल। लोक सभक लेल..चौपहर। धी-बेटी गामक, साफ-सफाई, झाड़ू-बहारू करैत रहथि। पक्काक मुदा बादमे भेल, छात ढलाइ आर बादमे। पिटुआ रहए पहिने। जमीनक प्लास्टर करबए चाहैत रहथि, मुदा एस्टीमेट बेशी भऽ गेलन्हि। भगवानक घर चुबैत रहत? मुदा ढलाई आ प्लास्टर लेल पाइ कतएसँ आओत?
आइ हमरा लगैए जे हम सभ खूब मेहनति करैत छी। ककरोसँ सरोकार नहि अछि। ओह, समैए नहि भेटैत अछि। मुदा अनमाना दीदीक दिनचर्या, भोरसँ साँझ भगवान लेल समर्पित। मुदा पोसपुत्र लेल सेहो समए निकालैत छथि। बीच-बीचमे झंझारपुर बजार लग स्थित अपन गाम जाइत छथि। ओतुक्को ब्योँत लगबैत छथि। फेर गाम अबैत छथि..नैहर। देखू..गीता पढ़ि स्थितप्रज्ञ बनबाक अहाँक प्रयास। मुदा अनमना दीदी। गोर लगै छी दीदी। निकेना रहू। नहिये खुशी, नहिये कोनो दुखे। ने कोनो आवभगतक लालसा आ ने कोनो तरहक सहयोग प्राप्तिक आकांक्षा।
जोन ताकै लेल जाइत छथि धनुकटोली, दुसधटोली। ओतुक्का लोक इज्जतियो दै छन्हि, कोन हुनकर घरारी लेबाक छन्हि हिनका सभकेँ। ओतए हँसितो देखै छियन्हि। अपन टोलक लोकसँ हट्ठे कोनो काज लेल कहितो नहि छथि। एकटा काज करत आ कनियाँकेँ जा कऽ कहत। आ फेर दस साल धरि ओकर कनियाँ सुनबैत रहत।
-दीदी, हनुमान जीक काज छै, सड़कक कातमे छथि। हमहूँ सभ तँ जाइत-अबैत माथ झुका कऽ पुजबे करबन्हि। से बिनु बोनि लेने हम ई काज करब।
- नै यौ तीर्थ-बर्त आ भगवानक काज मँगनीमे नहि करबाक-करेबाक चाही। हम कोनो रानी-महरानी छी जे बेगारी खटा कऽ मन्दिर बनबाएब आ पोखरि खुनाएब।
मुदा ढलैय्या आ प्लास्टर!


सड़कक कातक भगवानक एहि मन्दिरक सटल एक बीघा खेत, सभटा अनमना दीदीक। ढलैय्या भऽ गेलाक बाद भगवानक नामसँ लिखि देतीह। जे अन्न-पानि होएतैक ओहिसँ भगवानक घरक चून-पोचारा आ सफाई होइत रहत।
कतेक दिनसँ पड़ोसी पछोड़ धेने छन्हि।
“दीदी। तोहर सभसँ लगक भातिज हमहीं छियौ। ई जमीन हमर घरसँ सटल अछि। पहिलुका लोक बान्ह-सड़कक कातमे छोट जाति आ मसोमातकेँ घर बना दैत रहै। मुदा आब जमाना बदलि गेल छै।आब तँ सड़कक कातक घर आ जमीनक मोल बढ़ि गेल छै। तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे। तखन ई जमीन हमरा सभ पटीदार लेल झगड़ाक कारण बनत। ”
तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे- कहि कऽ देखियौक कोनो सधवाकेँ। मुदा मसोमातसँ कहि सकै छिऐ- भने ओकर पोसपुत्र- पुतोहु- नैत-नातिन होइ। ठीक छै बाबू।
“भगवानक लेल निहुछल अछि ई जमीन। अहीसँ तँ हमर गुजर चलैए। जे किछु पेट काटि कऽ बचबैत छी से कोशिल्या- भगवानक घरक ढलैया आ प्लास्टर लेल। झंझारपुरक जमीन-जालक पाइ सभ बेटा पुतोहुक छन्हि। से हम कोना.. ”
“फेर दीदी। तूँ गप बुझबे नहि कएलेँ। जा जिबै छेँ राख ने। कर ने गुजर। हम तँ कहै छियौ जे तोरा मरलाक बाद जे पटीदार सभ आपसमे लड़त से तोरा नीक लगतौ। आ हम तोहर सभसँ आप्त भातिज...।”
देखियौ, कहै छै जे। भातिज बाहरमे नोकरी करै छथि। जे गाममे रहैए से तँ भेँट करएमे संकोच करैए जे किछु देमए नहि पड़ए। ई मुदा जहिया गाममे अबैए आ हम गाममे रहै छी तँ भेँट करबाक लेल अबिते अछि। आ एहि बेर तँ हम झंझारपुरमे रही तँ ओतहु आएल रहए। सैह तँ कहलियै जे ई कोना कऽ फुरेलै। से आब बुझलिऐ। मुदा ई ढलैय्या कोना कऽ होएत। प्लास्टर तँ बादोमे करबा देबै। ततेक चुबैए, एहि साल तँ आरो बेशी चुबए लागल अछि। पिटुआ छत, दुइयो साल नहि चलल। ओकरा ओदारि कऽ ढ़लैय्या करत करीम मियाँ आ लछमी मिस्त्री, तखने ठीक होएत। देखै छी।
भातिजक आबाजाही बढ़ि गेल अछि आइ-काल्हि।
“ठीक छै दीदी, अदहे जमीन दऽ दिअ। दस कट्ठामे अहाँक भातिजक बसोबासक संग भगवानक लेल सेहो जमीन बचि जाएत।”
“मुदा बान्हपर अहाँक घरारीक लागि तँ नहिए होएत। तखन की फएदा होएत अहाँकेँ।”
“छोड़ू ने। एखनो तँ टोल दऽ कऽ अबिते ने छी। चौक-चौबटिया आ बान्हक कातमे घर बनेबाक तँ आब ने चलन भेल अछि। आ आब चौबटिया आ बान्हक कातमे तँ भगवानेक घर ने शोभतन्हि। दस कट्ठाक दस हजार जहिया कहब हम दऽ देब। रजिस्ट्री बादेमे बरु होएत।”
“ठीक छै। तखन हम सोचि कऽ कहब। एक बेर बेटा पुतोहुसँ पूछि लैत छी।”
कोन उपाए। भगवानक घरक देबाल सभमे कजरी लागि गेल अछि। देबाल छोड़ू, बजरंगबलीक मूर्तिमे सेहो कजरी लागि गेल अछि। अनमना दीदी सोचिते रहि गेलथि। आ सोचिते-सोचिते भोर भऽ गेलन्हि।
दऽ दै छिऐ जमीन। आर उपाय की। नञि।
बेटा-पुतोहु कहलखिन्ह जे माए। ओतुक्का जमीन तँ भगवानक छन्हि। आ हम सभ से शुरुहे सँ बुझै छी। मुदा देखब। ओ कोनो चालि तँ नहि चलि रहल अछि।
“कोन चालि। पाइ तँ किछु बेशीए दऽ रहल अछि।”
भगवानक मन्दिरक लेल, दस कट्ठा कम थोड़बेक होइ छै। पाइ जुटबैत-जुटबैत मरि गेलहुँ। ई अधखरु मन्दिर ओहिने रहि जाएत ? गप करै छी लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ सँ।
दस हजारमे ढलैय्या, प्लास्टरक संग चहरदिवारी सेहो बनि जाएत। एस्टीमेट बनि गेल। रजिस्ट्रीक अगिले दिनसँ काज आरम्भ। आ भादवक पहिने समापन।

चलू रजिस्ट्री भऽ गेल। दासजी कागज-पत्तरमे बड्ड माहिर लोक। पुछबाक काज छै! - धुर। पकिया कागज बनल हएत।
“भगवानक लेल कागज बनेबाक पहिल अवसर भेटल अछि दीदी”- दासजीक गपसँ अनमना दीदी दासोदास भऽ गेलीह।
लोक कहै छै झुट्ठे जे लोकक श्रद्धा भगवानपर सँ कम भेल जाइ छै। ई दासजी। कहियो ने भेँट आ ने जान पहिचान। दू टा रजिस्ट्रीक कागत- एकटा दसकठिया भातिजक नाम आ दोसर भगवानक नाम, मुदा एक्के फीसमे बना रहल छथि। साफे कहि देलखिन्ह- दीदी भगवानक जमीनक रजिस्ट्रीक पाइ हम एकदम्मे नहि लेब। जे बेर-बखतपर काज आबए सैह ने अप्पन लोक। ठीके बूढ़-पुरान कहि गेल छथि। यैह सभ देखि कऽ ने कहने छथि।
अनमना दीदी बाइमे छथि। पएरे गाम अएलीह।सोहमे किछु नहि फुराइत छन्हि। मन्दिरकेँ अजबारू, काल्हिसँ काजक आरम्भ अछि। लछमी मिस्त्री अपन तेगारी, डोरी, करणी सभ राखि गेल अछि। डब्बुक सभ पानि भरबाक लेल अनमना दीदी जोगा कऽ राखनहिये छथि। पोखरि बगलेमे अछि। लीढ़सँ भरल, मुदा कातमे महीस सभकेँ पानि पिएबाक लेल लोक सभ कनेक साफ कइए देने अछि।
मुदा भोरेमे घोल-फुचुक्का। करीम मिआँकेँ काज करबासँ रोकि देल गेल। के रोकलक? भातिजकेँ खबरि दियौक। मुदा ओ तँ काल्हि झंझारपुरसँ सोझे नोकरीपर चलि गेलाह। रजिस्ट्रीक कागत ओना तँ अनमाना दीदी लग सेहो छन्हि। भातिजक सार रोकने अछि काज। चहारदिबारी नहि बनबए देत। मुदा काल्हि रजिस्ट्री काल तँ रहए ईहो। तखन? कहैत अछि जे बान्हक कातबला जमीन मेहमानक छियन्हि, ऐँ यौ। तखन तँ ई मन्दिरो ओकरे हिस्सामे भऽ गेलै। कोनो बुझबामे गलती तँ नहि कऽ रहल अछि। भातिज मासक शुरुहेमे जा कऽ तँ अओताह, दरमाहा लैए कऽ ने। मास भरि अनमाना दीदी गाम आ झंझारपुर करैत रहलीह। बेटा पुतोहु कहन्हि जे ई भातिजेक चालि तँ नहि अछि। नञि, से नहि कहू। दासजी तँ नीक लोक रहए। देखू।
“दीदी। अहाँकेँ कोनो धोखा भऽ रहल अछि।”
“तखन तँ ई मन्दिरो अहींक भेल ने।”
“नञि दीदी। ई मन्दिर तँ भगवानक छियन्हि। हुनके रहतन्हि। आ पाछूक जमीनक मालिक सेहो भगवाने।”
“आ तखन तँ हमर ई खोपड़ी सेहो अहींक भेल ने।”
“नञि दीदी। अहाँ जहिया धरि जीब तहिया धरि रहू। के मना करत? ”
“बौआ बड्ड उपकार अहाँक। आ पाछू दिसका जमीनक लागि तँ नञि बान्ह दिससँ अछि आ नहिये टोल दिससँ।”
“दीदी। अहाँ हमरा जमीन बाटे जाऊ ने के मना करत? आ आरिपर बाटे खेतमे सभ जाइते अछि। जकर खेत बान्हक कातमे नहि छै से की अपन खेतपर नहि जा सकैए। अहाँ तँ नबका लोकक भिन्न-भिनाउज बला गप कऽ रहल छी।”
“मुदा ई सभ अहाँ पहिने कहाँ कहने रही।”
“दीदी, अहाँकेँ सभटा कहने रही। मुदा लगैत अछि जे अहाँकेँ धोखा भऽ रहल अछि। नहि विश्वास होइए तँ दासजीकेँ बजा दैत छी। ओ तँ तेहल्ला अछि।”
“अच्छा तँ ओहो मिलल अछि।”
“दू रजिस्ट्रीक कागत बना कऽ बेचारा एक रजिस्ट्रीक पाइ लेलक आ अहाँ कहि रहल छी जे मिलल अछि।”- भातिजक स्वर तीव्र भऽ गेलन्हि। हाँफए लगलाह आ जोर-जोरसँ बजैत बिदा भऽ गेलाह।
अनमाना दीदीक लेल नैहरक ई भोर सासुरक ओहि भोर जेकाँ रहन्हि जाहि दिन ओ विधवा भेल रहथि। आइ गामक धी-बेटी ढ़ील-लीख बिछबा लेल नहि अएलीह। अनमाना दीदीक राति भरिक वार्तालाप- बजरंग बलीक संग। एखने एहि भोरमे खतम भेल अछि। लोक सभ अँगनामे बच्चाकेँ ठोकि कऽ सुता रहल रहए। भोरमे किछु गोटे आबि पंचैती करेबाक सुझाव दए गेलन्हि। मुदा अनमाना दीदीक रोष तँ बजरंगबलीसँ छलन्हि।
“भगवानक जमीन अदहा बेचि कऽ भगवानक घर बनबितहुँ, मुदा मन्दिरक सटल जमीन रजिस्ट्री करा लेलक आ जे जमीन बचल ओहिसँ मन्दिरक लागिये नहि रहल। लागि तँ छोड़ू ओहि पर जएबाक रस्ते बन्न कऽ देलक। आ ई बजरंगबली। महावीर। कोन शक्ति छैक एकरामे ? चालीस साल पेट काटि कऽ हिनका खोपड़ीसँ पक्काक घरमे अनलहुँ। ढलैय्या भऽ जइतए, चहरदिवारी बनि जइतए सैह टा मनोरथ रहए, आ सेहो हिनके लेल। हा... ”
एहि भोरमे भातिजक द्वारिपर ठाढ़ अनमाना दीदी। लोक सभक मोने जे आब आर बाझत झगड़ा। मुदा ई की भऽ रहल अछि। लछमियाँक भाए रिक्शा अनलक अछि। अनमाना दीदी भातिजक संग झंझारपुर जा रहल छथि। के कहलक? हुनकासँ तँ ककरो गपो नहि भेल रहै। हम कहनहियो रहियन्हि पंचैती कराऊ, मुदा मना जेकाँ कऽ देने रहथि। अच्छा, लछमीक भाए कहलक। हँ, रिक्शा बजबै लेल जे गेल रहए, से कहने हएत जे झंझारपुर जेबाक अछि।
दासजीकेँ एकटा आर रजिस्ट्रीक कागत बनबए पड़लन्हि। अनमाना दीदीकेँ देखि ओ सर्द भऽ गेल रहथि जे जानि नहि बूढ़ी की सभ सुनओथिन्ह। मुदा अनमाना दीदी ततेक ने तामसमे छलीह जे किछु नहि बजलीह। तामस पीबि गेलीह। ओहो पाछू बला जमीन भातिजकेँ रजिस्ट्री कऽ देलन्हि। आ झंझारपुर-स्टेशनसँ घुरि कऽ झंझारपुर बजार दिस बेटा पुतोहु लग पएरे बिदा भेलीह।
लछमीक भाए घुरि आएल। दू सवारीकेँ लऽ गेल रहए मुदा मात्र एक सवारी लऽ कऽ घुरि आएल। संगमे संदेश लेने गेल। लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ लेल संदेश। काल्हि भोरेसँ काज आरम्भ। फेरसँ?
चहरदेबाली बनल। भगवानक मन्दिर आ अनमाना दीदीक घरकेँ बारि कऽ। कहि देने छियन्हि दीदी केँ। हुनका जिबैत क्यो छूतन्हि नहि हुनकर घर।
घर आकि खोपड़ी, एक साल कनेक टूटल। दोसर भदबरियामे खुट्टा सरि कऽ खसि पड़ल। मुदा अनमाना दीदी नहि अएलीह। समाद देने रहन्हि नैहरक एक गोटे। ढलैया नहिये भेलन्हि बजरंगबलीक। अनमना दीदी हरिद्वारसँ घुरि अएलीह। लोक पुछलकन्हि- की माँगलहुँ गंगा माएसँ।
“यएह जे अंधविश्वास हमरा मोनसँ हटा दिअ”।
“आ की देलियन्हि गंगा माएकेँ ?”
“अपन तामस दऽ देलियन्हि”।
अनमाना दीदी यएह कहथि- की करबन्हि। कोनो शक्तिये नहि छन्हि बजरंगबलीमे। खसए दियौक खोपड़ी। सोंगर लागल घर कतेक दिन काज देत।
कैक बरख बीतल। कैक बरख नहि पाँचमे साल तँ। भातिज गामपर आएल रहथि। दरमाहा उठा कऽ। पोखरि दिससँ चप्पाकलपर। लोटा लेने बैसलाह आकि छातीमे दर्द उठलन्हि। नहि बचि सकलाह। लोक सभ कहए, देखू अनमाना दीदीक श्राप, बड्ड कानल रहथि दीदी ओहि दिन। ओहिसँ पहिने बजरंगबलीक मूर्तिमे ठीके शक्ति नहि रहए। मुदा हृदयसँ देल श्राप लागै छै। ओही दिन जागृत भऽ गेल रहथि बजरंगबली। आ आइ शक्ति देखा देलखिन्ह।
मुदा समदियाकेँ अनमाना दीदी कहलखिन्ह जे पाथरोमे जान होइ छै। हर्ट अटैक भेल होएतैक। परसू एतहि एकटा मारवाड़ीकेँ अटैक भेल रहै। चिन्ता-फिकिरसँ होइत छैक एकर अटैक। एतए डाकडर सभ रहै, मारवाड़ी बाँचि गेल। गाममे देरी भेने जान नहि बचै छै। तेँ ने हमहूँ एहि बुढ़ारीमे बेटे पुतोहु लग झंझारपुरमे रहि रहल छी।
गाम अछि महिसबार ब्राह्मणक गाम। सुखरातिक दिन हूड़ा-हूड़ीक खेल जे एहि महिसबाड़ ब्राह्मण सभक देखलहुँ तँ पोलोक खेलमे कोनो रुचि नहि रहल। समियाक डोमसँ कीनल सुग्गरकेँ भाँग पिआए मातल महीस द्वारा हूड़ा लेब।
चरबाह जे महीसक पहुलाठ पकड़ि कलाकारीसँ बैसल छल सेहो अद्भुते। डोमक काज पाबनि-तिहारमे तँ होइते अछि। पेटार बनेबासँ सूप, बीअनि सभ किछु बनेबामे डोमक काज आ पाहुन परख लेल आ बरियाती लेल जे खस्सी काटल जाएत ताहि लेल मिआँटोलीक काज। खस्सीक मूड़ा दुर्गापूजाक बलिमे कमिटी लऽ लैत अछि।
धुर कतए भाँसि गेलहुँ।
से मिआँ जे खस्सी काटैत अछि से हलाल कऽ कऽ। गरदनि अदहा लटकले रहैत छै, मुदा माउस बना-सोना कऽ गरदनि लऽ जाइये आ खलरा सेहो। तखन महिसबार ब्राह्मणमे सँ जे हनुमानजी मन्दिरपर भजन आ अष्टजाम करैत छथि से ओही खलरासँ बनल ढोलक किनैत छथि। आ से कीर्तन भइयो रहल छल।
सिद्ध महावीरजीक मन्दिरक आगाँ। रामनवमी दिन गाड़ल बड़का धुजा। टनटनाइत घड़ीघण्ट आकि आर किछु। हनुमानजीक धूजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। महिसबार सभक आगम भऽ गेल अछि। कोनो पाबनि हुअए, हूड़ाहूड़ी आकि रामनवमी सिद्ध हनुमानजीक आगाँ कीर्तन होइते अछि। से बाबू गौँआक श्रद्धाक गप छिऐ। से आइयो भऽ रहल अछि।
घूरक धुँआ माल बिठौरीकेँ मालक देहसँ अलग करबाक प्रयासमे अछि। एक गोटेक संग दोसर गोटे अएल छथि, सप्पत खएबाक लेल। हनुमानजीक मन्दिर गौँआ सभ प्लास्टर करबा देने छथि। ढलैय्या सेहो भऽ गेल अछि। मन्दिरक बरण्डा छूबि कऽ ऋण पचेनहारक संख्या नगण्य, तैयो एकटा अपवाद तँ अछिये- ओ कहै छथि- सप्पत तँ तोड़बा लेल खाएल जाइ छै। हँ भाइ, एक बेर सप्पत खेने जे ऋणसँ विमुक्ति भेटि जाए तँ हर्जे कोन। मुदा एकेटा अपवाद। अनमाना दीदीकेँ आब सभ अनमाना बाबा सेहो कहैत छन्हि। कएक बरख भेल मुइना हुनकर। घुरि कऽ नहिये अएलीह। भातिजक घरारीक दोष निवारणार्थ कोनो पंडितक कहलापर खुट्टापर एकटा गाए बान्हि देल गेल छै, जकरा एनहार-गेनहार सदिखन घास खाइत देखैत छथि, तहिसँ घरारीकेँ नजरि-गुजरि नहि लगतैक।
हनुमानजीक धुजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकक थापपर थाप लगा रहल छथि।
अनमाना बाबाक गप आब किछु लोको सभ मानलक। ठीके। हनुमानजीक मूर्तिक आगाँ भक्त दूटा गोल बनि गेल अछि। एक गोलक विचार कनेक वैज्ञानिक छैक- अनमाना दीदी जे बाँचल दस कट्ठाक रजिस्ट्री कऽ देलखिन्ह सएह ने पैसा देलकै चिन्ता-फिकिर भातिजक छातीमे। नहि सम्हारि सकल अनमाना दीदीक ई आक्रमण ओ। ठीके पाथरमे कोनो शक्ति थोड़बेक होइ छै। मुदा दोसर गोल महावीर हनुमानजीक सिद्ध आ जागृत होएबामे विश्वास कऽ रहल अछि- यौ, चुट्टीकेँ माटि दऽ दियौ तँ ओहो मड़ि जाएत मुदा बिकुटि कऽ जे काटत से छोड़त नहि। आ ई माटि अनमना दीदी महावीरजी केँ देलखिन्ह तँ ओ कोना छोड़ि दितथिन्ह।
गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकपर थापपर थाप लगा रहल छथि, बुझू सिद्ध महाबीरजीकेँ मनाइये कऽ छोड़ताह, भाँगक गोला असरि कऽ रहल छन्हि, आँखि तँ चढ़ले छन्हि, हाथ सेहो रुकै कऽ नाम नै लऽ रहल छन्हि, आ हुनकर नजरिसँ देखी तँ सिद्ध महावीरक पाथरक मुरुत जागृत भऽ गेल देखा पड़त, जेना ओहिमे जान आबि गेल हो!




शब्दशास्त्रम्

सिंह राशिमे सूर्य, मोटा-मोटी सोलह अगस्त सँ सोलह सितम्बर धरि। किछु सुखेबाक होअए तँ सभसँ कड़ा रौद। सिंह राशिमे मिलूक पिताक तालपत्र सभ पसरल रहैत छल, वार्षिक परिरक्षण योजना, जे एहि तालपत्र सभमे जान फुकैत छल। आनन्दा मिलूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ करैत रहथि। कड़गर रौदमे तालपत्र पसारैत आनन्दा, मिलूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मिलू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। मुदा एहि बरखक सिंहराशि अएलासँ पूर्वहि आनन्दा चलि गेलीह...  आ आब जखन ओ नहि छथि तखन जीवनक परिरक्षण कोना होएत। मिलूक आ ओहि तालपत्र सभक जीवनक..
भ्रम। शब्दक भ्रम। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि।

लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया
तहि तर कोइली घऽमचान हे
कटबै चनन गाछ, बेढ़बै अँगनमा
छुटि जेतऽ कोइली घऽमचान हे
कानऽ लगली खीजऽ लागल, बोन के कोइलिया
टूटि गेलऽ कोइली घऽमचान हे
जानू कानू जानू की, जोबोन के कोइलिया
अहि जेतऽ कोइली घऽमचान हे
जहि बोन जेबऽ कोइली
रहि जेत तऽ निशनमा
जनू झरू नयना से लोर हे
सोने से मेढ़ायेब कोइली तोरो दुनू पँखिया
रूपे से मेरायेब दुनू ठोर हे
जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम
रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे

कोनो युवतीक अबाज चर्मकार टोलसँ अबैत बुझना गेल..आनन्दाक अबाज।
मुदा आनन्दा तँ चलि गेली, कनिये काल पहिने ओकर लहाश देखि आएल छथि बचलू। मिलूकेँ समाचार कहि डोमासी घुरि गेल छथि।आनन्दा, ओ तँ बूढ़ भऽ मरलीहेँ। तखन ई अबाज, युवती आनन्दाक। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि मिलूक पिता श्रीधर मीमांसक मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि।

I
शब्दशास्त्रम्

गर्दम गोल भेल छल।
अनघोल मचि गेल छलै। बागमती धारमे कोनो लहाश बहल चलि जा रहल छल। धोबियाघाट लग कात लागल छल।
कतेक दूरसँ आएल छल से नहि जानि। कोनो बएसगर महिलाक लहाश छल। धोबिन लहाशकेँ चीन्हि गेल रहथि। गौआँकेँ कहि दै छथि ओकर नाम आ पता। गौआँ के, वैह गामक डोमासीक बचलूकेँ। मृतकक घरमे खबरि भऽ गेल छलै। एसकरे एकटा बुढ़ा रहैए ओहि घरमे...मिलू।
मिलूक टोलबैया गौँआ सभ लहाशकेँ डीहपर आनि लेने छल आ फेर मिलू ओकर दाह-संस्कार कऽ देने रहथि।
गाममे अही गपक चर्चा रहै। बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि किछु आर गप। चिन्है छथि ओ ओहि लहाशक मनुक्खकेँ। नवका लोककेँ बहुत रास गप नै बुझल छै।
आनन्दाक लहाश..
-आनन्दा बड्ड नीक रहै। बुझनुक। ओकर बचिया सभ सभटा सुखितगर घरमे छै..बेटा सेहो विद्वान। मिलू, आनन्दाक वर सेहो उद्भट..श्रीकर मीमांसकक पुत्र..। मुदा कहियो मिलू आकि आनन्दा कोनो खगतामे ककरो आगाँ हाथ नहि पसारने छथि।
बचलू सेहो आब बूढ़ भऽ गेल छथि, झुनकुट बूढ़। हिनकासँ पैघ मात्र मिलू छथिन्ह। लोक सभ दुनू गोटेकेँ बुढ़ा कहि बजबै छन्हि।
आ एहि बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि ढेर रास गप।
.....
मिलू आ श्रीधरक वार्तालाप। किछु बुझिऐ आ किछु नहि।
-मिलू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे अविद्या जीवपर आश्रित अछि आ विषय बनि गेल अछि। आत्मसाक्षात्कार लेल कोन विधि स्वीकार करब? असत्य कथूक कारण कोना भऽ सकत? कोनो बौस्तुक सत्ता ओकरा सत्य कोना बना देत, त्रिकालमे ओकर उपस्थिति कोना सिद्ध कऽ सकत? जे बौस्तु नहि तँ सत्य अछि आ नहिये असत्य आ नहि अछि एहि दुनूक युग्मरूप; सैह अछि अनिर्वाच्य। बिना कोनो वस्तु आ ओकर ज्ञान रखनिहारक शून्यक अवधारणा कोना बूझऽमे आओत?
-मिलू। कुमारिल कहै छथि आत्मा चैतन्य जड़ अछि, जागलमे बोध आ सूतलमे बोधरहित।
-मिलू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।
आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।ई गप मुदा सरिया कऽ बूझबामे आएल रहए हमरा।

....
आमक मास रहै।
बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ।
 “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि।”
हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग आएल छलै।
आमेक मास रहै। से मिलू ओगरबाहीमे लागत आब। आमक टिकुला पैघ भऽ रहल छै। मचान बान्हबाक रहै मिलूकेँ। हमहूँ संगमे रहियै। बाँस काटि कऽ अबैत रही।
डबरा कात दऽ कऽ अबि रहल छलहुँ। भोरहरबा छल। अकास मध्य लाल रेख कनेक पिरौँछ भेल बुझना गेल छल।
-लीख दऽ कऽ चलू बचलू।
खेतक बीचमे लीख देने आगाँ बढ़ऽ लागलहुँ।
तखने हम शोणित देखलहुँ। हमर देह शोनित देखि सर्द भऽ गेल।
मुदा निशाँस छोड़लहुँ। बाँसक तीक्ष्ण पात एकटा बालिकाक हाथ आ मुँहकेँ नोछड़ैत गेल रहै। मिलूक बाँसक नोछाड़ ओकरा लागल रहै।
मिलू हाथसँ बाँस फेकि कऽ ओहि बालिका लग चलि गेल छल।
नोराएल आँखिक ओहि बालिकाक शोणित पोछि मिलू ओकर नोछारपर माटि रगड़ि देने रहै।
-की कऽ रहल छी।
-शोनित बन्न भऽ जाएत।
बालिका लीखपर आगाँ दौगि गेल छलीह।
-की नाम छी अहाँक।
-आनन्दा।
-कोन गामक छी।
-अही गामक।
-अही गामक?
हम दुनू गोटे संगे बाजल रही।
हँ, आनन्दा नाम रहै ओकर। आ मिलूक पहिल भेँट वैह रहै।
...
मचानो बन्हा गेल रहए। मुदा आनन्दा फेर नहि भेटल रहए।
मिलू पुछैत रहए।
-कोन टोलक छी ओ। नहिये मिसरटोलीक अछि आ नहिये ठकुरटोलीक।
-डोमासीक रहितए तँ हम चिन्हिते रहितिऐ।
-तखन कोना अछि ओ अपन गामक। आ अपन गामक अछि तँ आइ धरि भेँट किए नहि भेल रहए ओकरासँ।
मुदा बिच्चेमे संयोग भेल छल। मिलूक टोलमे फुदे भाइक बेटाक उपनयन रहै। बँसकट्टी दिन पिपहीबलाकेँ बजबैले हम गामक बाहर चर्मकार टोल गेल रही।
-हिरू भाइ, हिरुआ भाइ।
-आबै छथि।
कोनो बालिकाक अबाज आएल रहए। अबाज चिन्हल सन।
-अहाँ के छी।
-हम हिरूक बेटी। की काज अछि?
-पिपही लऽ कऽ एखन धरि अहाँक बाबू नहि पहुँचल छथि। बजबैले आएल छियन्हि।
-तही ओरियानमे लागल छथि।
-अहाँक नाम की छी?
तखने टाट परक लत्तीकेँ हँटबैत वैह बालिका सोझाँ आबि गेलि।
-हम आनन्दा। हम अहाँकेँ चीन्हि गेल रही। अहाँक की नाम छी?
हम तँ सर्द भेल जाइत रही। मुदा उत्तर देबाके छल।
-बचलू।
-आ अहाँक संगीक।
-मिलू, पंडित श्रीधरक बेटा।
मिलूक पिताक नाम सेहो हम आनन्दाकेँ बता देलिऐ। पुछने तँ नहि छलि ओ, मुदा नहि जानि किएक..कहि देलिऐ।
तखने हिरुआ पिपही लेने आबि गेल रहथि। हुनका संगे हम अपन टोल आबि गेलहुँ।
रस्तामे हिरुआकेँ पुछलियन्हि- आनन्दा अहाँक बेटी छथि। मुदा कहियो देखलियन्हि नहि।
-मामागाममे बेशी दिन रहै छलै। मुदा आब चेतनगर भऽ गेल छै। से गाम लऽ अनने छिऐ।
-फेर मामागाम कहिया जएतीह।
-नञि, आब ओ चेतनगर भऽ गेल अछि। आब संगे रहत।
पंडितजीक बेटा मिलू, हमर संगी मिलू, ई गप सुनि की होएतैक ओकरा मोनपर। कैक दिनसँ ओकर पुछारी कऽ रहल छल। हम सोचने रही जे भने मामागाम चलि जाए आनन्दा आ कनेक दिनमे मिलूक पुछारीसँ हम बाँचि जाएब।
मुदा आब तँ आनन्दा गामेमे रहत आ पंडित श्रीधरक बेटा मिलू..
धुर..हमहीं उनटा-पुनटा सोचि लेने छी। ओहिना दू-चारि बेर मिलू आनन्दाक विषयमे पुछारी केने अछि। तकर माने ई थोड़बेक भेलै जे..
मुदा जे सैह भेलै तखन ?..
पंडितक बेटा आ चर्मकारक बेटी..
पंडित श्रीधर मानताह?..गौआँ घरुआ मानत?
धुर। फेर हम उनटा-पुनटा सोचि रहल छी। पिपही बाजए लागल रहए आ लीखपर देने हम आ मिलू, भरि टोलक स्त्रीगण-पुरुषक संगे बँसबिट्टी पहुँचि गेल रही। रस्तामे ओहि स्थलकेँ अकानने रही। मिलू आ आनन्दाक पहिल मिलनक स्थलकेँ- कोनो अबाज लागल अबैत..मात्र संगीत..स्वर नहि।
बरुआ बाँस सभपर थप्पा दऽ देने रहै आ सभ बाँस कटनाइ शुरू कऽ देने रहथि। मड़बठट्ठी आइये छै। घामे-पसीने भेने कनेक मोन तोषित भेल। कन्हापर बाँस लेने हम आ मिलू ओही रस्ते बिदा भेल रही..ओही लीख देने।
मुदा मिलू हमरा सदिखन टोकारा देमए लागल। कारण कोनो काज हम एतेक देरीसँ नञि केने रहिऐ। ओ हमर राम रहए आ हम ओकर हनुमान।
मचानपर एहिना एक दिन हम मिलूकेँ कहि देलिऐ-
-मिलू, बिसरि जो ओकरा। कथी लेल बदनामी करबिहीं ओकर। हिरुआक बेटी छिऐ आनन्दा। ओना तोहर नाम हमरासँ ओ पुछलक तँ हम तोहर नाम आ तोहर पिताजीक नाम सेहो कहि देलिऐ।
-हमर पिताजीक नाम ओ पुछने रहौ?
-नहि पुछने रहए। मुदा..
-तखन किए कहलहीं?
-आइ ने काल्हि तँ पता लागबे करतै..
-जहिया लगितै तहिया लगितै..आब ओ हमरासँ कटत..हमर मेहनति तूँ बढ़ा देलेँ..
-कोन मेहनति। तूँ पंडित श्रीधरक बेटा आ ओ हिरुआ चर्मकारक बेटी। कथीले बदनामी करबिहीं ओकर।
-बियाह करबै रौ। बदनामी किए करबै।
-ककरा ठकै छिहीं ?
-ककरो नै रौ।
एहिना अनचोक्केमे निर्णय लैत छल मिलू। श्रीधर मीमांसकक बेटा मिलू नैय्यायिक। ओकरा घरमे तालपत्र सभ पसरल रहैत देखने छलिऐ। से भरोस नै भऽ रहल छल।
-गाममे कहियो देखलिऐ नै ओकरा।
-तूँ गाममे रहलेँ कहिया। गुरुजीक पाठशालासँ पौरुकेँ तँ आएल छेँ।
-मुदा तूँहीं कोन देखने रहीं।
-मामा गाम रहै छल ओ।
-फेर मामा गाम घुरि कऽ तँ नहि चलि जाएत।
-नै, से पुछि लेलिऐ। आब गामेमे रहत।
पौरुकाँ गामेमे मिलूक माएक देहान्त भऽ गेल छलन्हि।
श्रीधर मीमांसक सेहो खटबताह सन भऽ गेल छथि- ई गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। तालपत्र सभक परिरक्षण कोना हएत एहि सिंह राशिमे? यैह चिन्ता रहन्हि श्रीधरक, आ तेँ ओ खटबताह सन करए लागल रहथि.. ईहो गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल।
...
हिर्र..हिर्र…हिर्र....
डोमासीसँ सूगरक पाछू हम आ मिलू हिर्र-हिर्र करैत चर्मकार टोल पहुँचि जाइ छी। आनन्दा मुदा सोझाँमे भेटि गेलीह। सुग्गर संगे हम आगाँ बढ़ि जाइ छी। घुमै छी तँ आनन्दा आ मिलूक गप सुनैले कान पाथै छी।
हिर्र..हिर्र
एहि बेर आनन्दा हिर्र कहैत अछि आ हम मुस्की दैत सूगरक आगाँ बढ़ि जाइ छी।
ई घटना कैक बेर भेल आ ई गप सगरे पसरि गेल। हिरू कताक बेर हमरा लग आएल रहथि।
हीरू उद्वेलित रहए लागल रहथि। हीरूक पत्नी बेटीक भाग्यक लेल गोहारि करए लगलीह।
कए कोस माँ मन्दिलबा
कए कोस लुकेसरी मन्दिलबा
कए कोस पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
कए कोस पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
दुइ कोस मन्दिलबा
चारि कोस लुकेसरी मन्दिलबा
पाँचे कोस पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
पाँचे कोस पड़ल दोहाइ

कोन फूल माँ मन्दिलबा
कोन फूल बन्दी मन्दिलबा
कोन फूल पर पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
कोन फूल पर पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
ऐली फूल माँ मन्दिलबा
बेली फूल लुकेसरी मन्दिलबा
गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
.........
हिरू डोमासी आबए लागल रहथि।
-की हेतै, कोना हेतै।
-झुट्ठे..
हम गछलियन्हि जे हम हिरु संगे श्रीधर पंडित लग जाएब।
आ हम हिरूकेँ श्रीधर मीमांसक लग लऽ गेल रहियन्हि। श्रीधरक पत्नीक मृत्यु गत बरखक सिंह राशिक बाद भऽ गेल छलन्हि। आ तकर बाद हिरू मीमांसक खटबताह भऽ गेल छथि- लोक कहैत छलन्हि। लोक के? वैह टोलबैय्या सभ। गामक लोक, परोपट्टाक विद्वान लोक सभ तँ बड्ड इज्जत दै छलन्हि हुनका। आँखिक देखल गप कहै छी..
“आउ बचलू। हिरू, आउ बैसू..। ”- गुम्म भऽ जाइत छथि श्रीधर। पत्नीक मृत्युक बाद एहिना, रहैत रहथि, रहैत रहथि आकि गुम्म भऽ जाइत रहथि।
“कक्का, आँगन सुन्न रहैत अछि। कतेक दिन एना रहत। मिलूक बियाह किए नै करा दै छियन्हि”?
“मिलू तँ बियाह ठीक कऽ लेने छथि”।
“कत्तऽ?” -हम घबड़ाइत पुछै छियन्हि। हिरू हमरा दिस निश्चिन्त भावसँ देखै छथि।
“आनन्दासँ, समधि हीरू तँ अहाँक संग आएल छथिये।”
हाय रे श्रीधर पंडित।
आ बाह रे मिलू। पहिनहिये बापकेँ पटिया लेने छल। मुदा बान्हपर जाइत कोनो टोलबैय्याक कान एहि गपकेँ अकानि लेने छल।
हम सभ बैसले रही आकि ओ किछु आर गोटेकेँ लऽ कऽ दलानपर जुमि गेल छल। श्रीधर मीमांसकसँ हुनकर सभक शास्त्रार्थ शुरू भेल। शब्दक काट शब्दसँ।
“श्रीधर, अहाँ कोन कोटिक अधम काज कऽ रहल छी”।
“कोन अधम काज”।
“छोट-पैघक कोनो विचार नहि रहल अहाँकेँ मीमांसक?”
“विद्वान् जन। ई छोट-पैघ की छिऐ? मात्र शब्द। एहि शब्दकेँ सुनलाक पश्चात् ओकर शब्दार्थ अहाँक माथमे एक वा दोसर तरहेँ ढुकि गेल अछि। पद बना कऽ ओहिमे अपन स्वार्थ मिज्झर कऽ...”।
“माने छोट-पैघ अछि शब्दार्थ मात्र। आ तकर विश्लेषण जे पद बना कऽ केलहुँ से भऽ गेल स्वार्थपरक”।
“विश्वास नहि होए तँ ओहि पदमे सँ स्वार्थक समर्पण कऽ कए देखू। सभ भ्रम भागि जाएत”।
“माने अहाँ मिलू आ आनन्दाक बियाह करेबाले अडिग छी”।
“विद्वान् जन। रस्सीकेँ साँप हम अही द्वारे बुझै छी जे दुनूक पृथक अस्तित्व छै। आँखि घोकचा कऽ दूटा चन्द्रमा देखै छी तँ तखनो अकाशक दूटा वास्तविक भागमे चन्द्रमाकेँ प्रत्यारोपित करै छी। भ्रमक कारण विषय नहि संसर्ग छै, ओना उद्देश्य आ विधेय दुनू सत्य छै। आ एतए सभ विषयक ज्ञान सेहो आत्माक ज्ञान नहि दऽ सकैए। आत्माक विचारसँ अहंवृत्ति- अपन एहि तथ्यक बोध होइत अछि। आत्मा ज्ञानक कर्ता आ कर्म दुनू अछि। पदार्थक अर्थ संसर्गसँ भेटैत अछि। शब्द सुनलाक बाद ओकर अर्थ अनुमानसँ लग होइत अछि”।
“अहाँ शब्दक भ्रम उत्पन्न कऽ रहल छी। हम सभ एहिमे मिलू आ आनन्दाक बियाहक अहाँक इच्छा देखै छी”।
“संकल्प भेल इच्छा आ तकर पूर्ति नहि हो से भेल द्वेष”।
“तँ ई हम सभ द्वेषवश कहि रहल छी। अहाँक नजरिमे जातिक कोनो महत्व नहि?”
“देखू, आनन्दा सर्वगुणसम्पन्न छथि आ हुनकर आ हमर एक जाति अछि आ से अछि अनुवृत्त आ सर्वलोक प्रत्यक्ष। ओ हमर धरोहरक रक्षण कऽ सकतीह, से हमर विश्वास अछि। आ ई हमर निर्णय अछि”।
“आ ई हमर निर्णय अछि।”- ई शब्द हमर आ हिरूक कानमे एक्के बेर नै पैसल रहए। हम तँ हिरु आ मिलूकेँ चिन्हैत रहियन्हि, एहिना अनचोक्के निर्णय सुनबाक अभ्यासी भऽ गेल रही। मुदा हिरु कनेक कालक बाद एहि शब्द सभक प्रतिध्वनि सुनलन्हि जेना। हुनकर अचम्भित नजरि हमरा दिस घुमि गेल छलन्हि।
फेर श्रीधर मीमांसक ओहि शास्त्रार्थी सभमेसँ एक ज्योतिषी दिस आंगुर देखबै छथि-
“ज्योतिषीजी, अहाँ एकटा नीक दिन ताकू। अही शुद्धमे ई पावन विवाह सम्पन्न भऽ जाए। सिंह राशि आबैबला छै, ओहिसँ पूर्व। किनको कोनो आपत्ति?”
सभ माथ झुका ठाढ़ भऽ जाइ छथि। श्रीधर मीमांसकक विरोधमे के ठाढ़ होएत?
“हम सभ तँ अहाँकेँ बुझबए लेल आएल छलहुँ। मुदा जखन अहाँ निर्णय लैये लेने छी तखन...।”
मीमांसकजीक हाथ उठै छन्हि आ सभ फेर शान्त भऽ जाइ छथि।
हम आ हीरू सेहो ओतएसँ बिदा भऽ जाइ छी।
हीरू निसाँस लेने रहथि, से हम अनुभव केने रही।
...
ई नहि जे कोनो आर बाधा नहि आएल।
मुदा ओ खटबताह विद्वान तँ छले। से आनन्दा हुनकर पुतोहु बनि गेलीह। आ हुनक छुअल पानि हमर टोल की परोपट्टाक विद्वान् क बीचमे चलए लागल।
.....
आनन्दाक नैहरमे विवाह सम्पन्न भेल छल। ओतुक्का गीतनाद हम सुनने रही, उल्लासपूर्ण, एखनो मोन अछि-
पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल,
मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे
उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे
पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल,
मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे
उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे

कोन फूल  ओढ़ब लुकेसरि के
कोन फूल पहिरन
कोन फूल बान्धिके सिंगार हे

उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे
बेली फूल ओढ़ब बन्दी
चमेली फूल पहिरन
अरहुल फूल लुकेसरि के सिंगार हे
उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे
उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे
....
श्रीधर मीमांसक आनन्दाकेँ तालपत्र सभक परिरक्षणक भार दऽ निश्चिन्त भऽ गेल रहथि। पत्नीक मृत्युक बाद बेचारे आशंकित रहथि।
दैवीय हस्तक्षेप, आनन्दा जेना ओहि तालपत्र सभक परिरक्षण लेल आएल रहथि हुनकर घर। अनचोक्के..
मिलू कहि देलक हमरा जे कोना ओ श्रीधर पंडितकेँ पटिया लेने रहए। ब्राह्मणक बेटी सराइ कटोरा आ माटिक महादेव बनबैत रहत आ तालपत्र सभमे घून लागि जाएत..
नै घून लागए देथिन तालपत्र सभमे, आनन्दा आएत एहि घर। श्रीधर मीमांसक निर्णय कऽ लेने रहथि।
मिलू तँ जेना जीवन भरि अपन लेल एहि निर्णयक प्रति कृतज्ञ छलाह।
श्रीधरक आयु जेन बढ़ि गेल छलन्हि। श्रीधर आ आनन्दाक मध्य गप होइते रहै छल ओहि घरमे।
आनन्दा बजिते रहै छलीह आ गबिते रहै छलीह।

बारहे बरिस जब बीतल तेरहम चढ़ि गेल हे
बारहे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल हे
ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ
बघिनियाँ घरसे निकालब हे
ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ
बघिनियाँ घरसे निकालब हे

अंगना जे बाहर तोहि छलखिन रिनियाँ गे
ललना गे आनि दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे
ललना रे आनी दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे
बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे
बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे
ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे
ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे

बारह हे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल रे
ललना रे सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ
बघिनिया घरसे निकालब रे
सासु मोरा मारथिन अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे
सासु मोरा मारथि अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे
ललना रे गोटनो खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे
ललना रे गोटनऽ खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे

चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे
चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे
धनी हे करबै हे तुलसी के जाग, की धन सभ लुटा देबऽ हे
ललना हे करबै मे पोखरि के जाग, की सभ धन लुटाएब हे

श्रीधर मीमांसक हँसी करथिन- आनन्दा, अहाँकेँ तँ सासु अछि नहि, तखन ओ बेचारी अहाँकेँ बघिनियाँ कोना कहतीह?
-तेँ ने गबै छी, सभ चीज तँ भरल-पूरल मुदा..।
आँखि नोरा गेल छलन्हि आनन्दाक। हमरा अखनो मोन अछि।
-हम अहाँकेँ दुःख देलहुँ ई गप कहि कऽ।
-कोन दुःख? सासु नै छथि तँ ससुर तँ छथि।
श्रीधरकेँ प्रसन्न देखि मिलूकेँ आत्मतोष होइन्ह।
.......
आ श्रीधर मीमांसकक मृत्युक बादो आनन्दा तालपत्र सभमे जान फुकैत रहैत छलीह।
फेर मिलूकेँ दूटा बेटी भेलन्हि वल्लभा आ मेधा।
आनन्दाक खुशी हम देखने छी। नैहर गेल रहथि ओ। ओतहि दुनू जौँआ बेटी भेल छलन्हि-

लाल परी हे गुलाब परी
लाल परी हे गुलाब परी
हे गगनपर नाचत इन्द्र परी
हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी

आ फेर भेलन्हि बेटा। पैघ भेलापर बेटा मेघकेँ पढ़बा लेल बनारस पठेने रहथि मिलू।
आ दिन बितैत गेल, बेटी सभ पैघ भेलन्हि आ दुनू बेटी, मेधा आ वल्लभाक बियाह दान कऽ निश्चिन्त भऽ गेल छलाह मिलू।
बेटाक परवरिश आ बियाह दान सेहो केलन्हि। मेघ बनारसमे पाठन करए लगलाह। मेघ, मेधा आ वल्लभा तीनू गोटे सालमे एक मास आबथि धरि अवश्य।
लोक बिसरि गेल मारते रास गप सभ।

II
भामती प्रस्थानम्
आनन्दा मिलूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ  कऽ रहल छथि। कड़गर रौद, मिलूकेँ ओहिना मोन छन्हि।
मिलू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। आ आब जखन ओ नहि छथि तखन मिलूक जीवनक परिरक्षण कोना होएत।.. मिलू प्रवचनक बीचमे कतहु भँसिया जाइ छथि।
प्रवचन चलि रहल अछि। मिलू गरुड़ पुराण नहि सुनताह। मिलू मंडनक ब्रह्मसिद्धि सुनताह, वाचस्पतिक भामती सुनताह, जे सुनबो करताह तँ। जँ बेटी सभक जिद्द छन्हिये तँ आत्मा विषयपर कुमारिलक दर्शन सुनताह। आ सैह प्रवचन चलि रहल अछि।
भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि श्रीधर मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। भामती प्रस्थानम् पर। शब्दक अर्थ हम गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि।
-गुरुजी। हम पत्नीक मृत्युक बाद घोर निराशामे छी। की छिऐ ई जीवन। कतए होएत आनन्दा।
- मिलू। धीरज राखू। ब्रह्मसिद्धिक हमर ई पाठ अहाँक सभ भ्रमक निवारण करत। ब्रह्मसिद्धिमे चारि काण्ड छै। ब्रह्म, तर्क, नियोग आ सिद्धि काण्ड। ब्रह्मकाण्डमे ब्रह्मक रूपपर, तर्ककाण्डमे प्रमाणपर, नियोगकाण्डमे जीवक मुक्तिपर आ सिद्धिकाण्डमे उपनिषदक वाक्यक प्रमाणपर विवेचन अछि।
- मिलू। मुक्ति ज्ञानसँ पृथक् कोनो बौस्तु नहि अछि। मुक्ति स्वयं ज्ञान भेल। मानवक क्षुद्र बुद्धिक कतहु उपेक्षा मंडन नहि केने छथि। कर्मक महत्व ओ बुझैत छथि। मुदा ताहिटा सँ मुक्ति नहि भेटत। स्फोटकेँ ध्वनि-शब्दक रूपमे अर्थ दैत मंडन देखलन्हि। से शंकरसँ ओ एहि अर्थेँ भिन्न छथि जे एहि स्फोटक तादात्म्य ओ बनबैत छथि मुदा शंकर ब्रह्मसँ कम कोनो तादात्म्य नहि मानै छथि। से मंडन शंकरसँ बेशी शुद्ध अद्वैतवादी भेलाह।
-मिलू। मंडन क्षमता आ अक्षमताक एक संग भेनाइकेँ विरोधी तत्व नहि मानैत छथि। ई कखनो अर्थक्रियाकृत भेद होइत अछि, मुदा ओ भेद मूल तत्व कोना भऽ गेल। से ई ब्रह्म सभ भेदमे रहलोपर सभ काज कऽ सकैए।
-देखू। वाचस्पतिक भामती प्रस्थानक विचार मंडन मिश्रक विचारसँ मेल खाइत अछि। मंडन मिश्रक ब्रह्मसिद्धिपर वाचस्पति तत्वसमीक्षा लिखने छथि। ओना तत्वसमीक्षा आब उपलब्ध नै छै।
-तखन तत्व समीक्षाक चर्चा कोना आएल।
-वाचस्पतिभामतीमे एकर चर्चा छै।
-मुदा मंडनक विचार जानबासँ पूर्व हमरा मोनमे आबि रहल अछि जे जखन ओ शंकराचार्यसँ हारि गेलाह तखन हुनकर हारल सिद्धान्तक पारायणसँ हमरा मोनकेँ कोना शान्ति भेटत।
-देखियौ, मंडन हारि गेल छलाह तकर प्रमाण मंडनक लेखनीमे नहि अछि। मंडन स्फोटवादक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्य स्फोटवादक खण्डन करैत छथि। मंडन कुमारिल भट्टक विपरीत ख्यातिक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्यक जाहि शिष्य सुरेश्वराचार्यकेँ लोक मंडन मिश्र बुझै छथि ओ एकर खण्डन करै छथि।
-से तँ ठीके। मंडन हारि गेल रहितथि तँ हुनकर दर्शन शंकराचार्यक अनुकरण करितन्हि।
-आब कहू जे जाहि सुरेश्वराचार्यकेँ शंकराचार्य श्रृंगेरी मठक मठाधीश बनेलन्हि से अविद्याक दू तरहक हेबाक विरोधी छथि मुदा मंडन अपन ग्रन्थ ब्रह्मसिद्धिमे अग्रहण आ अन्यथाग्रहण नामसँ अविद्याक दूटा रूप कहने छथि। मंडन जीवकेँ अविद्याक आश्रय आ ब्रह्मकेँ अविद्याक विषय कहै छथि मुदा सुरेश्वराचार्य से नै मानै छथि। शंकराचार्यक विचारक मंडन विरोधी छथि मुदा सुरेश्वराचार्य हुनकर मतक समर्थनमे छथि।
.......
बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। आब हमरा दुआरे गामक लोक महीस पोसनाइ तँ नहि छोड़ि देत। बानर आ बनगदहा बड्ड नोकसान कऽ रहल अछि।
“चारिटा बानर कलममे अछि। धऽ कऽ आम सभकेँ दकड़ि देलक। हम गेल रही। साँझ भऽ गेलै तँ आब सभटा बानर गाछक छिप्पी धऽ लेने अछि। साँझ धरि दुनू बापुत कलम ओगरने रही, झठहा मारि भगेलहुँ, मुदा तखन अहाँक कलम दिस चलि गेल”।–- हम मिलूकेँ हम कहै छियन्हि।
सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि। करऽ दियौ जखन...”।
“बनगदहा सभ तँ साफ कऽ उपटि गेल छलै। नहि जानि फेर कत्तऽ सँ आबि गेल छै। गजपटहा गाममे जाग भेल छलै, ओम्हरेसँ राता-राती धार टपा दै गेल छै”।
“से नै छै। ई बनगदहा सभ धारमे भसिया कऽ नेपाल दिसनसँ आएल छै। आबऽ दियौ जखन...”।
“हम बानर सभ दिया कहने रही”।
“से हेतै”।
“हेतै भाइज, तखन जाइ छी”। हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग निपत्ता भऽ गेल रहै जाहि बरख आनन्दा आ मिलूक भेँट भेल रहै। आ आनन्दाक गेलाक बाद बानर आ बनगदहा नहि जानि कत्तऽ सँ फेर आबि गेल छै, आनन्दाक मृत्युक पन्द्रहो दिन नै बीतल छै...
.......
बचलू गेलाह आ मिलूक कपारपर चिन्ताक मोट कएकटा रेख ऊपर नीचाँ होमए लगलन्हि, हिलकोरक तरंग सन, एक दोसरापर आच्छादित होइत, पुरान तरंग नव बनैत आ बढ़ैत जाइत। अंगनामे सोर करै छथि। “बुच्ची, बुचिया। जयकर आ विश्वनाथ आइ गाछी गेल रहए। आबि गेल अछि ने दुनू गोड़े। सुनलिऐ नै जे बानर सभक उपद्रव भऽ गेल छै। काल्हिसँ नै जाइ जाएत गाछी, से कहि दियौ। आइ बानर सभ कलम आएल छल, से कहबो नै केलहुँ। कहिये कऽ की होएत जखन...”।
“कहि तँ रहल छलहुँ बाबूजी मुदा अहाँ तँ अपने धुनमे रहै छी, बाजैत मुँह दुखा गेल तँ चुप रहि गेलहुँ”।
हँ, धुनिमे तँ छथिये मिलू। ई आम सेहो आनन्दाक मृत्युक बाद पकनाइ शुरू भऽ गेल अछि। आ एतेक दिनुका बाद फेर ई बानर आ बनगदहा कोन गप मोन पारबा लेल फेरसँ जुमि आएल अछि।
...
जयकरक माए वल्लभा आ विश्वनाथक माए मेधा। दुनू बहीन कतेक दिनपर आएल छथि नैहर। कतेक दिनपर भेँट भेल छन्हि एक दोसरासँ। आनन्दाक दुनू बेटी आ दुनू जमाए आएल छथि। वल्लभाक पति विशो आ मेधाक पति कान्ह। मेघ अपन पत्नी आ बच्चा सभक संगे आएल छथि।
मिलू पत्नीकेँ आनन्दा कहि बजा रहल छथि। फेर मोन पड़ै छन्हि जे ओ आब कत्तऽ भेटतीह। फेर कत्तऽ छी वल्लभा, कत्तऽ छी मेधा, जयकर आ विश्वनाथ कतए छथि..सोर करए लागै छथि।
वल्लभा आ मेधा अबै छथि आ मिलू गीत गबए लगै छथि। आनन्दाक गीत। आनन्दा जे गबै छलीह वल्लभा आ मेधा लेल-
लाल परी हे गुलाब परी
लाल परी हे गुलाब परी
हे गगनपर नाचत इन्द्र परी
हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी

रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी
हे रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी
माँ हे निरधनकेँ धन यै देने परी
माँ हे निरधनकेँ धन जे देने परी

लाल परी हे गुलाब परी
माँ हे रकतमाला दुआरपर अन्धरा खड़ी
माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी
माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी

बाप आ दुनू बेटी भोकार पाड़ए लगै छथि।
...
-मिलू। आनन्दाक मृत्यु अहाँ लेल विपदा बनि आएल अछि। अहाँ ब्राह्मण जातिक आ आनन्दा चर्मकारिणी। मुदा दुनू गोटेक प्रेम अतुलनीय। हुनकर मृत्यु लेल दुःखी नहि होउ। ब्रह्म बिना दुखक छथि। ब्रह्मक भावरूप आनन्द छियन्हि। से आनन्दा लेल अहाँक दुःखी होएब अनुचित। ब्रह्म द्रष्टा छथि। दृश्य तँ परिवर्तित होइत रहैए, ओहिसँ द्रष्टाकेँ कोन सरोकार। ई जगत-प्रपंच मात्र भ्रम नहि अछि, एकर व्यावहारिक सत्ता तँ छै। मुदा ई व्यावहारिक सत्ता सत्य नहि अछि।
-मिलू। चेतन आ अचेतनक बीच अन्तर छै मुदा से सत्य नै छै। जीवक कएकटा प्रकार छै, आ अविद्याक सेहो कएकटा प्रकार छै। अविद्या एकटा दोष भेल मुदा तकर आश्रय ब्रह्म कोना होएत, पूर्ण जीव कोना होएत। ओकर आश्रय होएत एकटा अपूर्ण जीव। अविद्या तखन सत्य नहि अछि मुदा खूब असत्य सेहो नहि अछि।
-मिलू। एहि अविद्याकेँ दूर करू आ तकरे मोक्ष कहल जाइत अछि। वैह मोक्ष जे आनन्दा प्राप्त केने छथि।
आ मिलूक मुखपर जेना शान्ति पसरि जाइ छन्हि।
........
मिलू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि।
मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप।
हँ आनन्दा आएल अछि बचलू। देखियौ ई गीत सुनू-

घर पछुवरबामे अरहुल फूल गछिया हे
फरे-फूले लुबुधल गाछ हे
उतरै राजसए सुगा एक आओल
बैसल सूगा अरहुल फूल गाछ हे
फरबो ने खाइ छऽ सुगबा, फुलहो ने खाइ छऽ हे
डाढ़ि-पाति केलक कचून हे
फुलबो ने खाइ छऽ सुगबा, फरहु ने खाइ छऽ हे
डाढ़ि-पाति केलक कचून हे
घर पछुवरबामे बसै सर नढ़िआ हे
बैसल सूगा दिअ ने बझाइ हे

एकसर जोड़ल सोनरिया
दुइसर जोड़ल हे
तेसर सर सूगा उड़ि जाइ हे
सुगबो ने छिऐ भगतिया
तितिरो ने छिऐ
येहो छिऐ गोरैय्या के बाहान हे

-भाइ अहाँ ई गीत नहि सुनि पाबि रहल छी की?
-भाइ सुनि रहल छी। देखियो रहल छी। आनन्दा भौजी छथि।
जहिया ओ मुइल छलीह तहियो सुनने रही- वएह रहथि- गाबै रहथि-
लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया
तहि तर कोइली घऽमचान हे

-शब्द भ्रम नहि छल ओ।
माँछ-मौस आ सत्यनारायण पूजाक बाद अगिले दिनक गप अछि। ने चानन गाछ कटेने रहथि आ ने अँगना बेढ़ने रहथि आनन्दा।
दोसर दिन ओहि चानन गाछक नीचाँ चर्मकारटोलमे गौआँ सभ दुनू गोटेक लहाश देखलन्हि। आ ईहो शब्द गगनमे पसरि गेल, सौँसे गौँआ सुनलक- आनन्दाक अबाजमे-
जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम
रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे
शब्द भ्रम नहि छल ओ।

 (ई कथा “शब्दशास्त्रम्” श्री उमेश मंडल गाम-बेरमा लेल।)

0 टिप्पणी:

Post a Comment